✽   प्रात:काल आरती
✽  संध्या आरती
सत् साहिब

परम सन्त गरीबदास जी का उद्घोष था 'सत् साहिब' जोकि सत्पुरूष कबीर साहिब से चला हुआ है। कबीर साहिब ने 'सत्' वेदों से तथा 'साहिब' कुरान शरीफ से लेकर 'सत् साहिब' बनाया, जो हिन्दू तथा मुसलमान दोनों की एकता का प्रतीक है। सत्गुरू गरीबदास साहिब के अनुयाई सन्त तथा भक्त आपस में मिलते समय 'सत् साहिब' कहते हैं तथा नत्मस्तक होकर नर रूप में नारायण को देखने का भाव प्रकट करते हैं।

सत् साहिब की तरह ही साहिब बन्दगी या प्रणाम साहिब आदि नमस्कारात्मिक शब्द हैं, जिन्हें अपनी श्रद्धानुसार चुना जा सकता है। इसलिए मैनें सद्गुरू जी के इस पावन—चरित्र में, नर—रूपी—नारायण को श्रद्धाभाव से प्रणाम करने की प्रथा का अनुमोदन किया है।