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परमहंस रामदेवानन्द जी महाराज

पूज्य स्वामी रामदेवानन्द जी महाराज का जन्म सन् 1875 ई. में हरियाणा के चरखी दादरी के पास 'बड़ा पैंतावास' गांव में एक सम्पन्न ब्राहम्ण परिवार में हुआ था। आप बाल्यकाल से ही भगवान की भक्ति में रूचि रखते थे। आपने केवल बीस वर्ष की उम्र में ही घर त्याग दिया तथा सन्यास लेकर विरक्त महात्माओं के साथ विचरने लगे। लगभग चालीस साल तक आप निर्जन वनों, पर्वतों पर रहकर कठोर साधना करते रहें।

एक बार जब आप प्रयाग कुम्भ पर आए हुए थे, वहां कुछ भक्त आपको नजफ़गढ़ (दिल्ली) में ले आए। उसी समय से आपने सत्गुरू गरीबदास जी की वाणी का पाठ करना प्रारम्भ किया। आपसे प्रभावित होकर, हजारों लोग आपके सम्पर्क में आकर आप के शिष्य बन गऐ तथा आपके ठहरने की सुविधा के लिए तीन जगह आश्रम बनाए गए। आप जी का खान—पान, रहन—सहन, एवं जीवन शैली एक सधे हुए योगी की भांति थी। आप ने अपने इष्टदेव सत्गुरू गरीबदास जी की स्थली 'श्री छुड़ानी धाम' में बहुत सेवा करवाई। साल में दोनों मेलों पर आप भण्डार देते थे। जो आज तक भी आपके भक्तों द्वारा प्रचलित है।

आप एक निष्ठावान सन्त थे। आप सतगुरू जी की वाणी ​तथा सतगुरू धाम में एक रस, जीवन पर्यन्त विश्वास करते रहे। आप ने छुड़ानी धाम में संत तथा भक्तों के ठहराने के लिए कई एक भवन बनवायें।

भक्तों के द्वारा बनवाये आश्रम नजफगढ़ (दिल्ली), मोगा तथा तलवण्डी (पंजाब) में आज भी आपकी स्मृति को ताजगी प्रदान किये हुए हैं। आपकी संगत में लगभग सैंकड़ों सुलझे हुऐ भक्त हैं, जो आज भी अपने सतगुरू जी की मान मर्यादा को ज्यों का त्यों बनाकर रखे हुए हैं। आपका सम्पूर्ण जीवन साधनाशील रहा है। अन्तिम समय में तो आप ज्यादातर अन्तर्मुख ही रहते थे। आप सदा ही सहज स​माधि में रहते हुए सन् 1996 ई में ज्योति—ज्यो​त समा गए। आपका प्यार, आपकी वाणी तथा आपका मार्ग दर्शन आज भी आपके शिष्यों द्वारा, हजारों—हजारों, भूल—भटकी आत्माओं को सन्मार्ग पर चलाने का काम कर रहा है।